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परवीन किये हमको

खैरात मोहब्बत की फिर भी ना मिली हमको सीरत ए गम ने मिजाज नमकीन दिए हमको दुःख दर्द से तालुकात रखता है हर एक शायर फिर उसने हर मसले से गमगीन किये हमको आज की रात, चाँद मेरे दिल का यूँ पर्वाज है उसने पहचाना मुझे मगर शाहीन किये हमको देखी है हमने भी दुनियां ये इश्क़ मोहब्बत की तकल्लुफ देकर मुस्कुरा के बे-दीन किये हमको हम कोई बे-चारे नहीं है उन्स की जब्त में रहबर जब चाह, चाह लिए वो, फिर गमगीन किये हमको  गौतम रहबर 

ताज़

तक़ाज़ा शफ़्फ़ाक़ का नूर-ए-ताज़ से  इक जरिया बज़्म-ए-शाही ज़माल से  उसको देखूँ तो लिखने लगता हूँ ग़ज़ल  जैसे निकला हो चाँद अभी घटाओं से  वो देखे ज़ब यूँ पर्दा-ए-नशीँ से कँवल  कैसे बचें हम अब उसकी इन अदाओं से  रहबर  

राजस्थानी बाला

इक खूबसूरत बाला है बालों का रंग काला  अधरों पर एक अलग ही मुस्कान सी ज्वाला  इन आँखों के दरमियाँ वो देखे और मुस्कुराये  ये मेरा चित्त उसे देखके बस बावला होता जाये  एक आभा जो दिनकर को मात देने में सक्षम है  कानो की बाली, नाक-नथनी हरेक में वो दक्ष है  स्वाभाव जैसा स्वाभिमानी का, जैसे ललाट तेज  चारु चंचल चपल सरिता जैसे बाँधे अपने केश  गौरी-पद्मिनी-गंवरी बाई और मीरा बाई, प्रतिरुप है  राजपूताने के आँगन में फिर एक पलता प्रतिरुप है  गाथा सुनो अब अगर तुम एक ही आर्यवर्त की  कहानी सुनाऊँ या सुनाऊँ नामावली वीरों की  यही धरा है राव जोधा, बीका के पुरुषार्थ की यही माटी है हम्मीर, सूरजमल और प्रताप की  देखो तुम उतर से दक्षिण, पूरव से पश्चिम  सौराष्ट्र से दक्कन, कैलाश से मछलीपट्टम  और देखो द्वीपो में उभरते उतखात को  फिर देखो उसी ज्वालामुखी के उबाल को  अब देखो तुम केसरिया संग जौहर को  देखो बहिनों का पेड़ो के लिए त्याग को  देखो तुम मुगलो के भीषण अत्याचार को देखो मेवाड़ के  तुम उसी लाल प्रताप को  देखो त...

इश्क़ -ए-मंज़र 2

एक आ'शार अच्छा है, अल्फाज़ से गुफ़्तगू बेहद अच्छी है, मुलाक़ात से कश्मकश रंगीन फ़िजाओ के पैमाने में  दिललगी अच्छी होती नहीं, हिफाज़त से ना जाने मैं क्यों तुम्हें देखा करता हूँ ये शौक-ए-हया अच्छा है, वावस्ता से रहबर 

इश्क़ - ए - मंज़र 3

इश्क़ हो, मोहब्बत या फिर हो ये याराना आ मेरे पास थोड़ी बाते हो या हो तराना एक शख्श से मिलना अच्छा है सेहत में  क्या फ़र्क़ पड़ता है, क्या कहता है जमाना बेशक महताब नहीं आफ़ताब के बगैर अब  हर पन्ने पे छोड़ रही स्याही एक अफसाना मैं तो नहीं काबिल सो खुदा की इबादत करू  क्या होगा हश्र उनका जिनका खुदा होगा परवाना महबूब के दीवानो में एक नाम और है रहबर  हमशक्ल भी क्या करे है वो अब बेचारा दीवाना गौतम रहबर 

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अक्सर आँखों से जुर्म लाजबाब होता है तिरे चेहरे पर इक पेशेवर नकाब होता है हम पड़े रहते थे आज से पहले मयखाने में अब लगने लगा है ये शराब हराम होता है मैंने चाह लिया था उसको होशो हवाश में लगने लगा था वो शख्श मेरा जनाब होता है भूल थी मेरी, जो किस्मत ठोकर खा गयी घूम फिर के फिर ये गम तेरे ही नाम होता है आज भी देता हूँ नसीहत जवाँ-ए-ख़ून को रहबर मोहब्बत करो पर जिसका हाजिर जबाब होता है गौतम रहबर ‌😁😊

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गम-ए-मोहब्बत  यूँ ना बे-हिसाब तुम चाहो मुझे फिर यूँ ना छोड़ कर जाओ मुझे हम तो तिरे इश्क़ के कायल है अब तुम इतना भी ना चाहो मुझे ये महिना बड़ा पाक है बचो इससे इश्क़ से नहीं फरेब से अब चाहो मुझे मैं तो क़त्ल कर आई हूँ जज्बातों का भरी आँखों से देखा क़ातिल ने चाहो मुझे वो महिना अब चला गया जो हमारा था इश्क़ हो गया अब गम-ए-मोहब्बत से मुझे  रहबर 

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कच्ची उम्र की मोहब्बत  ये कच्ची उम्र की मोहब्बत, बेढंग, बेरूप और दर-ओ-बदर, बे-पनाह मोहब्बत नहीं है अब और  इक किस्सा जोड़ने का हुनर तुम रखते हो जीस्त में  फिर उसी लहजे से ड़गर से गुजरेगा अब कोई और तुम तो अब कंही के नहीं रहे, बर्बाद हो गए 'आशिक़' फिर कच्ची उम्र में वही राग गाता है अब कोई और अब कितना समझाऊं मैं खुद को 'रहबर' नए ख़ून को देखता हूँ तो याद आता है अब कोई और हम तो बेवजह ही बदनाम रहते थे अपनी महफ़िल में इन किस्सों को सुनाता हूँ, तो कहते है, है अब कोई और  गौतम रहबर 

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हर सलीके से जीस्त को जिए जाना है  उसे अंजुमन में आ कर भी लौट जाना है कुदरत का करिश्मा देखो कैसी करवट है हर एक शख्श को फिर आजमाया जाना है सुबह हुई फिर वही पुराने बिखरे कागज शाम होते होते फिर वही उसी घर को जाना है कुछ न रहा जिंदगी में शौक के अलावा जिधर देखो हर शख्स हमें गमगीन किये जाना है हम कितना भी उड़ ले इस आसमां में फिर एक दिन उसी जमीं पे परचम लहराये जाना है तुम कहो क्या इबादत करते हो ख़ुदा से हर जर्रे में हर महफिल में तेरा नाम लिए जाना है हाँ हम हो गये पागल, तुझसे ये कैसा राब्ता है उसी शख़्स से हमें फिर हारते हुए जाना है  गर मैं ख़ुश हुआ इन छोटे मुकामों से "रहबर" तो फिर क्यूँ उस मुकाम का नक्शा लिए जाना है गौतम रहबर 

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ये मेरा क्या हश्र हुआ तुझसे मिलने के बाद ना मिली गले मैं तो मौत आई मिलने के बाद मैंने तुझ पर अपनी पूरी जिंदगी वार दी इक तू है आया तो मेरी अर्थी उठने के बाद गयी मैं जब तुझसे दूर तो दिल नहीं लगता मेरा विच पास आने वास्ते मैं सो गयी मिलने के बाद तू मिरा रांझा है कि गुलज़ार का नज़्मा-ए-अल्फाज़ रोई मैं तेज जब तू याद आया मुझे बिछड़ने के बाद 

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फिर उसके शहर से मुख़ातिब होना पड़ा दिललगी से बेसबब मुक़म्मल होना पड़ा हम तो पैहम उसे अब अपना मानते रहे आये करीब बे-सबब मयस्सर होना पड़ा मेरे लब काँपते रहे उसके हर शह से उसी के खेल में, फिर हमसफ़र होना पड़ा शुक्रिया उस खुदा का, जो रहबर है सबका उसके इश्क़ में फिर उसका रहबर होना पड़ा 

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दावते इश्क में यूँ वफ़ा कीजिये  बस यूँ ही मिलते रहा कीजिये मैं आऊंगा तेरी कब्र पर अब अक्सर जाते वक़्त भी मुस्कुराते रहा कीजिये इक सूरज है जिसका लशकर पेचीदा है सुनो तुम गम में भी मुस्कुराते रहा कीजिये

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दर्द ने मीर तक़ी मीर बना रखा है बेवजह उसने हकीम बना रखा है मैं अपने निशां गढ़ता जा रहा हूँ नए दौर का इक सलीम बना रखा है मैं कब से खुद को ढूंढता रहा हूँ  आईने से खुद को करीब बना रखा है  लाख कोशिसे की मैंने उससे बचने की इक उसने खुद को परवीन बना रखा है हो गए वो दूर हमसे, अब नहीं कहते उसे हर शख्स के हाथों अब जमीर बना रखा है  रहबर 

ishq - e - manzar 1

किस हक़ से आकर तुझ से मिलूंगा अब किस हक़ उसकी से गली में फिरूंगा अब मेरे मनसूबे की दिवाल पर तस्वीर थी उसकी काँपते लबों से, अश्क़ो से कैसे हटाऊँगा अब ये पहाड़ की चोटी है, मेरा रस्ता, तुझसे पाने का  देख लिया नीचे गलती से गर , ठेट गिरूंगा अब  गर पा लिया मैंने तेरे होने का साथ, जो था कभी  ख़्वाब भरी दुनियां, उठ कर पानी पी-लुंगा अब ये ख्वाब की बातें अगर रह गयी ख्वाबों में मेरे  वो दिन भी दूर नहीं, दोस्तों से नहीं मिलूंगा अब  जा मैंने तुझे आजाद किया, मोहबत से रिहा किया होगी गर बा-वफ़ा तुझमें, किनारे पैसे गिनुगा अब रहबर 

मुस्कान

मुस्कान   इन आँखों को किस कदर तुम पहचानते हो  कुछ नहीं हैं आँखों में, इतना सब जानते हो  आखिर तुम जीत गए इमरोज़ क़यामत में  फिर एक अजनबी की मुस्कान पहचानते हो  ये दौर अलग है, हर शख्स की बात अलग है  रंगा के मुझे रंग में, हर इख़्तियार को जानते हो  कर दूँ बयां गर मैं तुम्हारी मुस्कुराहट को यूँ ही  हम्म, यूँ ही नहीं तुम हमारी नजरों को चुराते हो  ना जाने कैसे मिल गए तुम हमें, कहता हैं 'रहबर ' अब इन्ही आँखों से तुम जज़्बातों को छुपाते हो  गौतम रहबर 

इश्क़-ए-इज़हार

ये मेरे हुस्न को हुआ क्या है तू बता ये दर्द-ए-गम क्या है  मियाँ थोड़ा मुस्कुराया करो   फिर ये लब-ए-जज़्बात क्या है  तुम चाहते हो उसे बेपनाह  वो चाहती है तुम्हें मसला क्या है  सुना हैं उसका इक दोस्त है तारों का रौशनी से रिश्ता क्या है  जिन लहजों से बातें करती है वो सबसे  वो सबके लिए, फिर मुझमें खास क्या है  गौतम रहबर

मोहब्बत

जब इश्क़ हो हमसे दग़ा करना बेपनाह हमसे यूँ ना वफ़ा करना हम नहीं काबिल तेरी मोहब्बत के हक़ जता कर यूँ ना सफा करना हमसे ना हो पायेगा ये दोहरा इश्क़ मंजर के साये में हँस के जफ़ा करना  मेरी शरारतें पसंद करती हो तुम वफ़ा इल्म के दरमियाँ अदा करना हाँ इश्क़ की जगह तुम मुझसे दग़ा करना तेरे मुस्कुराने भर से जां निसार करना 

तुम्हें लिखें हुए

बहुत दिन हो गए है हमें तुम्हें लिखे हुए फिर ना जाने कब उठाएंगे पत्ते गिरे हुए मैं तुझ पर कुछ ना कुछ लिखूं बस लिखूं उठा लूँ लफ़्ज़ अपने जो है कबके गिरे हुए मैं जब भी देखूँ तो बस तुम्हें ही देखूँ हाँ देखूँ तुम्हें जैसे हाला के प्याले में गिरे हुए हो जाऊँ फ़ना मैं तेरे जुल्फों के साये में जागूं तो उठा लूँ जो है नजरों में गिरे हुए ये तेरा मेरे पास होने का अच्छा तराना है जैसे  तकाजे का मारा शख्स उठाता है सिक्के गिरे हुए 

जब गिर के संभला मैं

.Mn  . 4.5 .. N.m. 3 JAB GIR KAR SMBHLA MAIN 4bnmm.. Jane anjane me ho gya wo bawla na jane kese bhool gya wo apna hi rasta samjh nhi aata ki logo ko pyar hota hai to kyu hota hai B4     ee man (soul) kuch smjha ise ee hawayen kuch dikha ise jitni mohabba krta hai usse ......... kyu nhi krta apne aapse................????? wo kyu nhi smjti in jajbato ko kyuki pyar smja betha hai wo un bato ko ghbra -ghbra kar poncha tha tu uske paas fir kya ghabra ghabra kar nibhayega tu uska sath ee mere man (soul) samjha ise ...... ee nadiyan kuch dikha ise ...... jane anjane me tu khda ho gaya ek mod par fir dubara kese nikl payega tu usi mod par..... ???? ye tanha ......., tanha nhi________ wo ek padav hai | wo pyar.........., pyar nhi ________wo ek lagav hai  |  diya  tha tune use ek gulab......... uski ek muskan pane ko  de gayi saza wo tuje tadpane ko... ee mere yaro wo muskan , muskan nhi dillgi thi wo jane, ...