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परवीन किये हमको





खैरात मोहब्बत की फिर भी ना मिली हमको
सीरत ए गम ने मिजाज नमकीन दिए हमको

दुःख दर्द से तालुकात रखता है हर एक शायर
फिर उसने हर मसले से गमगीन किये हमको

आज की रात, चाँद मेरे दिल का यूँ पर्वाज है
उसने पहचाना मुझे मगर शाहीन किये हमको

देखी है हमने भी दुनियां ये इश्क़ मोहब्बत की
तकल्लुफ देकर मुस्कुरा के बे-दीन किये हमको

हम कोई बे-चारे नहीं है उन्स की जब्त में रहबर
जब चाह, चाह लिए वो, फिर गमगीन किये हमको

 गौतम रहबर 











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इश्क़ - ए - मंज़र 3

इश्क़ हो, मोहब्बत या फिर हो ये याराना आ मेरे पास थोड़ी बाते हो या हो तराना एक शख्श से मिलना अच्छा है सेहत में  क्या फ़र्क़ पड़ता है, क्या कहता है जमाना बेशक महताब नहीं आफ़ताब के बगैर अब  हर पन्ने पे छोड़ रही स्याही एक अफसाना मैं तो नहीं काबिल सो खुदा की इबादत करू  क्या होगा हश्र उनका जिनका खुदा होगा परवाना महबूब के दीवानो में एक नाम और है रहबर  हमशक्ल भी क्या करे है वो अब बेचारा दीवाना गौतम रहबर 

मुस्कान

मुस्कान   इन आँखों को किस कदर तुम पहचानते हो  कुछ नहीं हैं आँखों में, इतना सब जानते हो  आखिर तुम जीत गए इमरोज़ क़यामत में  फिर एक अजनबी की मुस्कान पहचानते हो  ये दौर अलग है, हर शख्स की बात अलग है  रंगा के मुझे रंग में, हर इख़्तियार को जानते हो  कर दूँ बयां गर मैं तुम्हारी मुस्कुराहट को यूँ ही  हम्म, यूँ ही नहीं तुम हमारी नजरों को चुराते हो  ना जाने कैसे मिल गए तुम हमें, कहता हैं 'रहबर ' अब इन्ही आँखों से तुम जज़्बातों को छुपाते हो  गौतम रहबर 

12

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