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अक्सर आँखों से जुर्म लाजबाब होता है
तिरे चेहरे पर इक पेशेवर नकाब होता है

हम पड़े रहते थे आज से पहले मयखाने में
अब लगने लगा है ये शराब हराम होता है

मैंने चाह लिया था उसको होशो हवाश में
लगने लगा था वो शख्श मेरा जनाब होता है

भूल थी मेरी, जो किस्मत ठोकर खा गयी
घूम फिर के फिर ये गम तेरे ही नाम होता है

आज भी देता हूँ नसीहत जवाँ-ए-ख़ून को रहबर
मोहब्बत करो पर जिसका हाजिर जबाब होता है

गौतम रहबर
‌😁😊

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इज़हार -ए -मोहब्बत

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इश्क़ -ए-मंज़र 2

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