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Showing posts with the label इश्क़-ए-मंज़र

ishq - e - manzar 1

किस हक़ से आकर तुझ से मिलूंगा अब किस हक़ उसकी से गली में फिरूंगा अब मेरे मनसूबे की दिवाल पर तस्वीर थी उसकी काँपते लबों से, अश्क़ो से कैसे हटाऊँगा अब ये पहाड़ की चोटी है, मेरा रस्ता, तुझसे पाने का  देख लिया नीचे गलती से गर , ठेट गिरूंगा अब  गर पा लिया मैंने तेरे होने का साथ, जो था कभी  ख़्वाब भरी दुनियां, उठ कर पानी पी-लुंगा अब ये ख्वाब की बातें अगर रह गयी ख्वाबों में मेरे  वो दिन भी दूर नहीं, दोस्तों से नहीं मिलूंगा अब  जा मैंने तुझे आजाद किया, मोहबत से रिहा किया होगी गर बा-वफ़ा तुझमें, किनारे पैसे गिनुगा अब रहबर 

मुस्कान

मुस्कान   इन आँखों को किस कदर तुम पहचानते हो  कुछ नहीं हैं आँखों में, इतना सब जानते हो  आखिर तुम जीत गए इमरोज़ क़यामत में  फिर एक अजनबी की मुस्कान पहचानते हो  ये दौर अलग है, हर शख्स की बात अलग है  रंगा के मुझे रंग में, हर इख़्तियार को जानते हो  कर दूँ बयां गर मैं तुम्हारी मुस्कुराहट को यूँ ही  हम्म, यूँ ही नहीं तुम हमारी नजरों को चुराते हो  ना जाने कैसे मिल गए तुम हमें, कहता हैं 'रहबर ' अब इन्ही आँखों से तुम जज़्बातों को छुपाते हो  गौतम रहबर