Skip to main content

12

दर्द ने मीर तक़ी मीर बना रखा है
बेवजह उसने हकीम बना रखा है

मैं अपने निशां गढ़ता जा रहा हूँ
नए दौर का इक सलीम बना रखा है

मैं कब से खुद को ढूंढता रहा हूँ 
आईने से खुद को करीब बना रखा है 

लाख कोशिसे की मैंने उससे बचने की
इक उसने खुद को परवीन बना रखा है

हो गए वो दूर हमसे, अब नहीं कहते उसे
हर शख्स के हाथों अब जमीर बना रखा है 

रहबर 

Comments

Popular posts from this blog

इश्क़ - ए - मंज़र 3

इश्क़ हो, मोहब्बत या फिर हो ये याराना आ मेरे पास थोड़ी बाते हो या हो तराना एक शख्श से मिलना अच्छा है सेहत में  क्या फ़र्क़ पड़ता है, क्या कहता है जमाना बेशक महताब नहीं आफ़ताब के बगैर अब  हर पन्ने पे छोड़ रही स्याही एक अफसाना मैं तो नहीं काबिल सो खुदा की इबादत करू  क्या होगा हश्र उनका जिनका खुदा होगा परवाना महबूब के दीवानो में एक नाम और है रहबर  हमशक्ल भी क्या करे है वो अब बेचारा दीवाना गौतम रहबर 

मुस्कान

मुस्कान   इन आँखों को किस कदर तुम पहचानते हो  कुछ नहीं हैं आँखों में, इतना सब जानते हो  आखिर तुम जीत गए इमरोज़ क़यामत में  फिर एक अजनबी की मुस्कान पहचानते हो  ये दौर अलग है, हर शख्स की बात अलग है  रंगा के मुझे रंग में, हर इख़्तियार को जानते हो  कर दूँ बयां गर मैं तुम्हारी मुस्कुराहट को यूँ ही  हम्म, यूँ ही नहीं तुम हमारी नजरों को चुराते हो  ना जाने कैसे मिल गए तुम हमें, कहता हैं 'रहबर ' अब इन्ही आँखों से तुम जज़्बातों को छुपाते हो  गौतम रहबर