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ताज़











तक़ाज़ा शफ़्फ़ाक़ का नूर-ए-ताज़ से 
इक जरिया बज़्म-ए-शाही ज़माल से 

उसको देखूँ तो लिखने लगता हूँ ग़ज़ल 
जैसे निकला हो चाँद अभी घटाओं से 

वो देखे ज़ब यूँ पर्दा-ए-नशीँ से कँवल 
कैसे बचें हम अब उसकी इन अदाओं से 

रहबर 

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अक्सर आँखों से जुर्म लाजबाब होता है तिरे चेहरे पर इक पेशेवर नकाब होता है हम पड़े रहते थे आज से पहले मयखाने में अब लगने लगा है ये शराब हराम होता है मैंने चाह लिया था उसको होशो हवाश में लगने लगा था वो शख्श मेरा जनाब होता है भूल थी मेरी, जो किस्मत ठोकर खा गयी घूम फिर के फिर ये गम तेरे ही नाम होता है आज भी देता हूँ नसीहत जवाँ-ए-ख़ून को रहबर मोहब्बत करो पर जिसका हाजिर जबाब होता है गौतम रहबर ‌😁😊

इज़हार -ए -मोहब्बत

आँखों में कजरा बालों में गजरा हाय ये काली बिंदी वाला चेहरा तुम यूँ ना जुल्फें सवारों अब अब ये दिल मचल रहा है मेरा हाय ये बातें याद रहेगी हमको कानो में झुमका होगा नाम का मेरा हाँ थोडा अलग है मेरा तुम्हारा प्यार ये नजाकत भी करेगी अब इंतज़ार तेरा हाँ मैं सब कुछ छोड़ कर ये एलान करता हूँ ये इश्क़ दोस्ती, वफ़ा ही नहीं प्यार हूँ तेरा गौतम रहबर 

परवीन किये हमको

खैरात मोहब्बत की फिर भी ना मिली हमको सीरत ए गम ने मिजाज नमकीन दिए हमको दुःख दर्द से तालुकात रखता है हर एक शायर फिर उसने हर मसले से गमगीन किये हमको आज की रात, चाँद मेरे दिल का यूँ पर्वाज है उसने पहचाना मुझे मगर शाहीन किये हमको देखी है हमने भी दुनियां ये इश्क़ मोहब्बत की तकल्लुफ देकर मुस्कुरा के बे-दीन किये हमको हम कोई बे-चारे नहीं है उन्स की जब्त में रहबर जब चाह, चाह लिए वो, फिर गमगीन किये हमको  गौतम रहबर