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Showing posts from October, 2025

परवीन किये हमको

खैरात मोहब्बत की फिर भी ना मिली हमको सीरत ए गम ने मिजाज नमकीन दिए हमको दुःख दर्द से तालुकात रखता है हर एक शायर फिर उसने हर मसले से गमगीन किये हमको आज की रात, चाँद मेरे दिल का यूँ पर्वाज है उसने पहचाना मुझे मगर शाहीन किये हमको देखी है हमने भी दुनियां ये इश्क़ मोहब्बत की तकल्लुफ देकर मुस्कुरा के बे-दीन किये हमको हम कोई बे-चारे नहीं है उन्स की जब्त में रहबर जब चाह, चाह लिए वो, फिर गमगीन किये हमको  गौतम रहबर 

ताज़

तक़ाज़ा शफ़्फ़ाक़ का नूर-ए-ताज़ से  इक जरिया बज़्म-ए-शाही ज़माल से  उसको देखूँ तो लिखने लगता हूँ ग़ज़ल  जैसे निकला हो चाँद अभी घटाओं से  वो देखे ज़ब यूँ पर्दा-ए-नशीँ से कँवल  कैसे बचें हम अब उसकी इन अदाओं से  रहबर  

राजस्थानी बाला

इक खूबसूरत बाला है बालों का रंग काला  अधरों पर एक अलग ही मुस्कान सी ज्वाला  इन आँखों के दरमियाँ वो देखे और मुस्कुराये  ये मेरा चित्त उसे देखके बस बावला होता जाये  एक आभा जो दिनकर को मात देने में सक्षम है  कानो की बाली, नाक-नथनी हरेक में वो दक्ष है  स्वाभाव जैसा स्वाभिमानी का, जैसे ललाट तेज  चारु चंचल चपल सरिता जैसे बाँधे अपने केश  गौरी-पद्मिनी-गंवरी बाई और मीरा बाई, प्रतिरुप है  राजपूताने के आँगन में फिर एक पलता प्रतिरुप है  गाथा सुनो अब अगर तुम एक ही आर्यवर्त की  कहानी सुनाऊँ या सुनाऊँ नामावली वीरों की  यही धरा है राव जोधा, बीका के पुरुषार्थ की यही माटी है हम्मीर, सूरजमल और प्रताप की  देखो तुम उतर से दक्षिण, पूरव से पश्चिम  सौराष्ट्र से दक्कन, कैलाश से मछलीपट्टम  और देखो द्वीपो में उभरते उतखात को  फिर देखो उसी ज्वालामुखी के उबाल को  अब देखो तुम केसरिया संग जौहर को  देखो बहिनों का पेड़ो के लिए त्याग को  देखो तुम मुगलो के भीषण अत्याचार को देखो मेवाड़ के  तुम उसी लाल प्रताप को  देखो त...

इश्क़ -ए-मंज़र 2

एक आ'शार अच्छा है, अल्फाज़ से गुफ़्तगू बेहद अच्छी है, मुलाक़ात से कश्मकश रंगीन फ़िजाओ के पैमाने में  दिललगी अच्छी होती नहीं, हिफाज़त से ना जाने मैं क्यों तुम्हें देखा करता हूँ ये शौक-ए-हया अच्छा है, वावस्ता से रहबर 

इश्क़ - ए - मंज़र 3

इश्क़ हो, मोहब्बत या फिर हो ये याराना आ मेरे पास थोड़ी बाते हो या हो तराना एक शख्श से मिलना अच्छा है सेहत में  क्या फ़र्क़ पड़ता है, क्या कहता है जमाना बेशक महताब नहीं आफ़ताब के बगैर अब  हर पन्ने पे छोड़ रही स्याही एक अफसाना मैं तो नहीं काबिल सो खुदा की इबादत करू  क्या होगा हश्र उनका जिनका खुदा होगा परवाना महबूब के दीवानो में एक नाम और है रहबर  हमशक्ल भी क्या करे है वो अब बेचारा दीवाना गौतम रहबर 

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अक्सर आँखों से जुर्म लाजबाब होता है तिरे चेहरे पर इक पेशेवर नकाब होता है हम पड़े रहते थे आज से पहले मयखाने में अब लगने लगा है ये शराब हराम होता है मैंने चाह लिया था उसको होशो हवाश में लगने लगा था वो शख्श मेरा जनाब होता है भूल थी मेरी, जो किस्मत ठोकर खा गयी घूम फिर के फिर ये गम तेरे ही नाम होता है आज भी देता हूँ नसीहत जवाँ-ए-ख़ून को रहबर मोहब्बत करो पर जिसका हाजिर जबाब होता है गौतम रहबर ‌😁😊

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गम-ए-मोहब्बत  यूँ ना बे-हिसाब तुम चाहो मुझे फिर यूँ ना छोड़ कर जाओ मुझे हम तो तिरे इश्क़ के कायल है अब तुम इतना भी ना चाहो मुझे ये महिना बड़ा पाक है बचो इससे इश्क़ से नहीं फरेब से अब चाहो मुझे मैं तो क़त्ल कर आई हूँ जज्बातों का भरी आँखों से देखा क़ातिल ने चाहो मुझे वो महिना अब चला गया जो हमारा था इश्क़ हो गया अब गम-ए-मोहब्बत से मुझे  रहबर 

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कच्ची उम्र की मोहब्बत  ये कच्ची उम्र की मोहब्बत, बेढंग, बेरूप और दर-ओ-बदर, बे-पनाह मोहब्बत नहीं है अब और  इक किस्सा जोड़ने का हुनर तुम रखते हो जीस्त में  फिर उसी लहजे से ड़गर से गुजरेगा अब कोई और तुम तो अब कंही के नहीं रहे, बर्बाद हो गए 'आशिक़' फिर कच्ची उम्र में वही राग गाता है अब कोई और अब कितना समझाऊं मैं खुद को 'रहबर' नए ख़ून को देखता हूँ तो याद आता है अब कोई और हम तो बेवजह ही बदनाम रहते थे अपनी महफ़िल में इन किस्सों को सुनाता हूँ, तो कहते है, है अब कोई और  गौतम रहबर 

7

हर सलीके से जीस्त को जिए जाना है  उसे अंजुमन में आ कर भी लौट जाना है कुदरत का करिश्मा देखो कैसी करवट है हर एक शख्श को फिर आजमाया जाना है सुबह हुई फिर वही पुराने बिखरे कागज शाम होते होते फिर वही उसी घर को जाना है कुछ न रहा जिंदगी में शौक के अलावा जिधर देखो हर शख्स हमें गमगीन किये जाना है हम कितना भी उड़ ले इस आसमां में फिर एक दिन उसी जमीं पे परचम लहराये जाना है तुम कहो क्या इबादत करते हो ख़ुदा से हर जर्रे में हर महफिल में तेरा नाम लिए जाना है हाँ हम हो गये पागल, तुझसे ये कैसा राब्ता है उसी शख़्स से हमें फिर हारते हुए जाना है  गर मैं ख़ुश हुआ इन छोटे मुकामों से "रहबर" तो फिर क्यूँ उस मुकाम का नक्शा लिए जाना है गौतम रहबर 

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ये मेरा क्या हश्र हुआ तुझसे मिलने के बाद ना मिली गले मैं तो मौत आई मिलने के बाद मैंने तुझ पर अपनी पूरी जिंदगी वार दी इक तू है आया तो मेरी अर्थी उठने के बाद गयी मैं जब तुझसे दूर तो दिल नहीं लगता मेरा विच पास आने वास्ते मैं सो गयी मिलने के बाद तू मिरा रांझा है कि गुलज़ार का नज़्मा-ए-अल्फाज़ रोई मैं तेज जब तू याद आया मुझे बिछड़ने के बाद 

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फिर उसके शहर से मुख़ातिब होना पड़ा दिललगी से बेसबब मुक़म्मल होना पड़ा हम तो पैहम उसे अब अपना मानते रहे आये करीब बे-सबब मयस्सर होना पड़ा मेरे लब काँपते रहे उसके हर शह से उसी के खेल में, फिर हमसफ़र होना पड़ा शुक्रिया उस खुदा का, जो रहबर है सबका उसके इश्क़ में फिर उसका रहबर होना पड़ा 

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दावते इश्क में यूँ वफ़ा कीजिये  बस यूँ ही मिलते रहा कीजिये मैं आऊंगा तेरी कब्र पर अब अक्सर जाते वक़्त भी मुस्कुराते रहा कीजिये इक सूरज है जिसका लशकर पेचीदा है सुनो तुम गम में भी मुस्कुराते रहा कीजिये

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दर्द ने मीर तक़ी मीर बना रखा है बेवजह उसने हकीम बना रखा है मैं अपने निशां गढ़ता जा रहा हूँ नए दौर का इक सलीम बना रखा है मैं कब से खुद को ढूंढता रहा हूँ  आईने से खुद को करीब बना रखा है  लाख कोशिसे की मैंने उससे बचने की इक उसने खुद को परवीन बना रखा है हो गए वो दूर हमसे, अब नहीं कहते उसे हर शख्स के हाथों अब जमीर बना रखा है  रहबर