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कच्ची उम्र की मोहब्बत  ये कच्ची उम्र की मोहब्बत, बेढंग, बेरूप और दर-ओ-बदर, बे-पनाह मोहब्बत नहीं है अब और  इक किस्सा जोड़ने का हुनर तुम रखते हो जीस्त में  फिर उसी लहजे से ड़गर से गुजरेगा अब कोई और तुम तो अब कंही के नहीं रहे, बर्बाद हो गए 'आशिक़' फिर कच्ची उम्र में वही राग गाता है अब कोई और अब कितना समझाऊं मैं खुद को 'रहबर' नए ख़ून को देखता हूँ तो याद आता है अब कोई और हम तो बेवजह ही बदनाम रहते थे अपनी महफ़िल में इन किस्सों को सुनाता हूँ, तो कहते है, है अब कोई और  गौतम रहबर 

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हर सलीके से जीस्त को जिए जाना है  उसे अंजुमन में आ कर भी लौट जाना है कुदरत का करिश्मा देखो कैसी करवट है हर एक शख्श को फिर आजमाया जाना है सुबह हुई फिर वही पुराने बिखरे कागज शाम होते होते फिर वही उसी घर को जाना है कुछ न रहा जिंदगी में शौक के अलावा जिधर देखो हर शख्स हमें गमगीन किये जाना है हम कितना भी उड़ ले इस आसमां में फिर एक दिन उसी जमीं पे परचम लहराये जाना है तुम कहो क्या इबादत करते हो ख़ुदा से हर जर्रे में हर महफिल में तेरा नाम लिए जाना है हाँ हम हो गये पागल, तुझसे ये कैसा राब्ता है उसी शख़्स से हमें फिर हारते हुए जाना है  गर मैं ख़ुश हुआ इन छोटे मुकामों से "रहबर" तो फिर क्यूँ उस मुकाम का नक्शा लिए जाना है गौतम रहबर 

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ये मेरा क्या हश्र हुआ तुझसे मिलने के बाद ना मिली गले मैं तो मौत आई मिलने के बाद मैंने तुझ पर अपनी पूरी जिंदगी वार दी इक तू है आया तो मेरी अर्थी उठने के बाद गयी मैं जब तुझसे दूर तो दिल नहीं लगता मेरा विच पास आने वास्ते मैं सो गयी मिलने के बाद तू मिरा रांझा है कि गुलज़ार का नज़्मा-ए-अल्फाज़ रोई मैं तेज जब तू याद आया मुझे बिछड़ने के बाद 

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फिर उसके शहर से मुख़ातिब होना पड़ा दिललगी से बेसबब मुक़म्मल होना पड़ा हम तो पैहम उसे अब अपना मानते रहे आये करीब बे-सबब मयस्सर होना पड़ा मेरे लब काँपते रहे उसके हर शह से उसी के खेल में, फिर हमसफ़र होना पड़ा शुक्रिया उस खुदा का, जो रहबर है सबका उसके इश्क़ में फिर उसका रहबर होना पड़ा 

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दावते इश्क में यूँ वफ़ा कीजिये  बस यूँ ही मिलते रहा कीजिये मैं आऊंगा तेरी कब्र पर अब अक्सर जाते वक़्त भी मुस्कुराते रहा कीजिये इक सूरज है जिसका लशकर पेचीदा है सुनो तुम गम में भी मुस्कुराते रहा कीजिये

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दर्द ने मीर तक़ी मीर बना रखा है बेवजह उसने हकीम बना रखा है मैं अपने निशां गढ़ता जा रहा हूँ नए दौर का इक सलीम बना रखा है मैं कब से खुद को ढूंढता रहा हूँ  आईने से खुद को करीब बना रखा है  लाख कोशिसे की मैंने उससे बचने की इक उसने खुद को परवीन बना रखा है हो गए वो दूर हमसे, अब नहीं कहते उसे हर शख्स के हाथों अब जमीर बना रखा है  रहबर 

ishq - e - manzar 1

किस हक़ से आकर तुझ से मिलूंगा अब किस हक़ उसकी से गली में फिरूंगा अब मेरे मनसूबे की दिवाल पर तस्वीर थी उसकी काँपते लबों से, अश्क़ो से कैसे हटाऊँगा अब ये पहाड़ की चोटी है, मेरा रस्ता, तुझसे पाने का  देख लिया नीचे गलती से गर , ठेट गिरूंगा अब  गर पा लिया मैंने तेरे होने का साथ, जो था कभी  ख़्वाब भरी दुनियां, उठ कर पानी पी-लुंगा अब ये ख्वाब की बातें अगर रह गयी ख्वाबों में मेरे  वो दिन भी दूर नहीं, दोस्तों से नहीं मिलूंगा अब  जा मैंने तुझे आजाद किया, मोहबत से रिहा किया होगी गर बा-वफ़ा तुझमें, किनारे पैसे गिनुगा अब रहबर