Skip to main content

Posts

परवीन किये हमको

Recent posts

ताज़

तक़ाज़ा शफ़्फ़ाक़ का नूर-ए-ताज़ से  इक जरिया बज़्म-ए-शाही ज़माल से  उसको देखूँ तो लिखने लगता हूँ ग़ज़ल  जैसे निकला हो चाँद अभी घटाओं से  वो देखे ज़ब यूँ पर्दा-ए-नशीँ से कँवल  कैसे बचें हम अब उसकी इन अदाओं से  रहबर  

राजस्थानी बाला

इक खूबसूरत बाला है बालों का रंग काला  अधरों पर एक अलग ही मुस्कान सी ज्वाला  इन आँखों के दरमियाँ वो देखे और मुस्कुराये  ये मेरा चित्त उसे देखके बस बावला होता जाये  एक आभा जो दिनकर को मात देने में सक्षम है  कानो की बाली, नाक-नथनी हरेक में वो दक्ष है  स्वाभाव जैसा स्वाभिमानी का, जैसे ललाट तेज  चारु चंचल चपल सरिता जैसे बाँधे अपने केश  गौरी-पद्मिनी-गंवरी बाई और मीरा बाई, प्रतिरुप है  राजपूताने के आँगन में फिर एक पलता प्रतिरुप है  गाथा सुनो अब अगर तुम एक ही आर्यवर्त की  कहानी सुनाऊँ या सुनाऊँ नामावली वीरों की  यही धरा है राव जोधा, बीका के पुरुषार्थ की यही माटी है हम्मीर, सूरजमल और प्रताप की  देखो तुम उतर से दक्षिण, पूरव से पश्चिम  सौराष्ट्र से दक्कन, कैलाश से मछलीपट्टम  और देखो द्वीपो में उभरते उतखात को  फिर देखो उसी ज्वालामुखी के उबाल को  अब देखो तुम केसरिया संग जौहर को  देखो बहिनों का पेड़ो के लिए त्याग को  देखो तुम मुगलो के भीषण अत्याचार को देखो मेवाड़ के  तुम उसी लाल प्रताप को  देखो त...

इश्क़ -ए-मंज़र 2

एक आ'शार अच्छा है, अल्फाज़ से गुफ़्तगू बेहद अच्छी है, मुलाक़ात से कश्मकश रंगीन फ़िजाओ के पैमाने में  दिललगी अच्छी होती नहीं, हिफाज़त से ना जाने मैं क्यों तुम्हें देखा करता हूँ ये शौक-ए-हया अच्छा है, वावस्ता से रहबर 

इश्क़ - ए - मंज़र 3

इश्क़ हो, मोहब्बत या फिर हो ये याराना आ मेरे पास थोड़ी बाते हो या हो तराना एक शख्श से मिलना अच्छा है सेहत में  क्या फ़र्क़ पड़ता है, क्या कहता है जमाना बेशक महताब नहीं आफ़ताब के बगैर अब  हर पन्ने पे छोड़ रही स्याही एक अफसाना मैं तो नहीं काबिल सो खुदा की इबादत करू  क्या होगा हश्र उनका जिनका खुदा होगा परवाना महबूब के दीवानो में एक नाम और है रहबर  हमशक्ल भी क्या करे है वो अब बेचारा दीवाना गौतम रहबर 

4

अक्सर आँखों से जुर्म लाजबाब होता है तिरे चेहरे पर इक पेशेवर नकाब होता है हम पड़े रहते थे आज से पहले मयखाने में अब लगने लगा है ये शराब हराम होता है मैंने चाह लिया था उसको होशो हवाश में लगने लगा था वो शख्श मेरा जनाब होता है भूल थी मेरी, जो किस्मत ठोकर खा गयी घूम फिर के फिर ये गम तेरे ही नाम होता है आज भी देता हूँ नसीहत जवाँ-ए-ख़ून को रहबर मोहब्बत करो पर जिसका हाजिर जबाब होता है गौतम रहबर ‌😁😊

5

गम-ए-मोहब्बत  यूँ ना बे-हिसाब तुम चाहो मुझे फिर यूँ ना छोड़ कर जाओ मुझे हम तो तिरे इश्क़ के कायल है अब तुम इतना भी ना चाहो मुझे ये महिना बड़ा पाक है बचो इससे इश्क़ से नहीं फरेब से अब चाहो मुझे मैं तो क़त्ल कर आई हूँ जज्बातों का भरी आँखों से देखा क़ातिल ने चाहो मुझे वो महिना अब चला गया जो हमारा था इश्क़ हो गया अब गम-ए-मोहब्बत से मुझे  रहबर