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जाने दिल ये क्यों कहे रहा ...............



 जाने दिल ये क्यों कहे रहा ...............



ना जाने आज दिल ये क्यों कहे रहा |  
कि  नहीं रह सकता तुम्हारे बिना || 

खुले धागो के झमेले में उलझे है हम| 
जैसे उजाले की दुनिया में खो गए है हम|| 

जिसकी ख़बर तुझको भी है |
जिसकी ख़बर मुझको भी है ||

नहीं समझ पा रहे है हम| 
जाने कोनसी है ये बात ||

जीवन के इस घुमावदार मोड़ पर  मिले है इस तरह |
की कट  जाएगी ज़िंदगी हमारी एक अज़नबी बनकर|| 

होने को अज़नबी  है हम एक दूसरे  के लिए |
लेकिन वो (सहेली ) हमेशा कहती है, फिर क्यों बेताब हो तुम एक दूसरे के लिए|| 

न वो समझ पा रही है ना में समझ पा रहा| 
जाने किसी है ये अजीब दास्ताँ |

मित्रो की नज़रो में भाभी हो तुम |
भाइयो की नज़रो में तो भाभी हो तुम| 
लेकिन  मेरी नज़रो में. , मेरी नज़रो में एक बहुत अच्छी दोस्त हो और हाँ .................. और भी बहुत कुछ||

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इज़हार -ए -मोहब्बत

आँखों में कजरा बालों में गजरा हाय ये काली बिंदी वाला चेहरा तुम यूँ ना जुल्फें सवारों अब अब ये दिल मचल रहा है मेरा हाय ये बातें याद रहेगी हमको कानो में झुमका होगा नाम का मेरा हाँ थोडा अलग है मेरा तुम्हारा प्यार ये नजाकत भी करेगी अब इंतज़ार तेरा हाँ मैं सब कुछ छोड़ कर ये एलान करता हूँ ये इश्क़ दोस्ती, वफ़ा ही नहीं प्यार हूँ तेरा गौतम रहबर 

इश्क़ -ए-मंज़र 2

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4

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