Skip to main content

Posts

Showing posts from April, 2024

मोहब्बत

जब इश्क़ हो हमसे दग़ा करना बेपनाह हमसे यूँ ना वफ़ा करना हम नहीं काबिल तेरी मोहब्बत के हक़ जता कर यूँ ना सफा करना हमसे ना हो पायेगा ये दोहरा इश्क़ मंजर के साये में हँस के जफ़ा करना  मेरी शरारतें पसंद करती हो तुम वफ़ा इल्म के दरमियाँ अदा करना हाँ इश्क़ की जगह तुम मुझसे दग़ा करना तेरे मुस्कुराने भर से जां निसार करना 

तुम्हें लिखें हुए

बहुत दिन हो गए है हमें तुम्हें लिखे हुए फिर ना जाने कब उठाएंगे पत्ते गिरे हुए मैं तुझ पर कुछ ना कुछ लिखूं बस लिखूं उठा लूँ लफ़्ज़ अपने जो है कबके गिरे हुए मैं जब भी देखूँ तो बस तुम्हें ही देखूँ हाँ देखूँ तुम्हें जैसे हाला के प्याले में गिरे हुए हो जाऊँ फ़ना मैं तेरे जुल्फों के साये में जागूं तो उठा लूँ जो है नजरों में गिरे हुए ये तेरा मेरे पास होने का अच्छा तराना है जैसे  तकाजे का मारा शख्स उठाता है सिक्के गिरे हुए